रिस्क फैक्टर - कामयाबी का स्रोत

समय-समय पर भारतीय क्रिकेट टीम को अनेक नायाब हीरे कप्तान के तौर पर मिले हैं।सुनील गावस्कर,कपिल देव,अजहर, गांगुली, धोनी, कोहली–ये सभी कुछ न कुछ खास रिस्क उठाने के लिए जाने जाते हैं परन्तु यहां मैं सर्वप्रथम जिक्र कृष्णामाचारी श्रीकांत का करना चाहूंगा, जिनके छोटे से कार्यकाल में महान् तेंदुलकर जैसी नैसर्गिक प्रतिभा का उदय हुआ और जिसे तराशने का काम स्टाइलिश अजहरुद्दीन ने किया। तेंदुलकर बतौर ओपनर बन गए,जिसका परिणाम किसी से छिपा नहीं। और भी,एक मैच में इंग्लैंड के खिलाफ श्रीकांत ने दो विकेट जल्दी गिरने पर चेतन शर्मा को भेज दिया और क्या खूब बल्लेबाजी रही उनकी।उनका वो इकलौता शतक आज भी लोगों के जेहन में है।मैच भारत ने छः विकेट से जीता था। इस तरह के कई उदाहरण भारतीय क्रिकेट में हैं। गांगुली ने अपना स्थान छोड़कर वीरेंद्र सहवाग को ओपनिंग का जिम्मा सौंपा। कहने में कोई गुरेज नहीं कि गेंदबाज चाहे कोई भी हो, सहवाग का खौफ उन सभी के दिलो-दिमाग पर सदैव रहा।आज भी बेझिझक सहवाग भारतीय क्रिकेट के निर्विवाद सबसे ख़तरनाक ओपनर बल्लेबाज के रूप में जाने जाते हैं।

रिस्क फैक्टर - कामयाबी का स्रोत

उपर्युक्त सभी उदाहरण रिस्क लेने के हैं। अर्थशास्त्र में मार्केटिंग के अंदर रिस्क फैक्टर का काफी महत्त्व रहा है और यही बात अन्य टीमों की तरह टीम इंडिया पर भी लागू होती है। गांगुली के द्वारा दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अंतिम ओवर सहवाग को देना,विश्व कप फाइनल में द ग्रेट धोनी के द्वारा नए -नवेले जोगिंदर शर्मा को अंतिम ओवर में गेंदबाजी सौंपना,वन डे में रोहित शर्मा को ओपनिंग के लिए भेजा जाना, और तो और राहुल द्रविड़ की भांति के एल राहुल से विकेटकीपिंग कराना —-ये सभी के सभी रिस्क फैक्टर हैं, जिससे भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाई मिली है, बुलंदियों पर टीम इंडिया पहुंची है।

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सच तो यह है कि श्रीकांत,अजहर, गांगुली, धोनी और वर्तमान में कोहली ने अपनी कल्पनाशीलता,क्रिकेटीय मस्तिष्क , साथ ही रिस्क लेने की अद्भुत क्षमता से भारतीय टीम के साथ भारतवासियों को गर्व से सिर ऊंचा करने का मौका प्रदान किया है।

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